मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

जुकरबर्ग नहीं एक भारतीय के दिमाग की उपज है फेसबुक

   "मार्क जुकरबर्ग" यह नाम आज भारत के साथ-साथ दुनिया में किसी परिचय का मोहताज नहीं, और इस नाम को इतनी शोहरत मिली फेसबुक से. जी हाँ आज फेसबुक के संस्थापक के रूप मार्क जुकरबर्ग को पूरी दुनिया में पहचाना जाता है. लेकिन कम से कम हम भारतीयों को यह जानकारी अवश्य होनी चाहिए की फेसबुक का आइडिया मार्क जुकरबर्ग का नहीं बल्कि एक भारतीय-अमेरिकी दिव्य नरेंद्र का था.
     जी हाँ, दिव्य नरेंद्र के माता-पिता दशको पहले भारत छोड़कर अमेरिका जाकर बस गए थे, उन्हें वहीँ की नागरिकता भी मिल गए. दिव्य नरेंद्र का जन्म 18 मार्च 1982 को अमेरिका में हुआ था. दिव्य नरेंद्र के माता-पिता पेशे से डॉक्टर है और वह अपने बेटे को डॉक्टर ही बनाना चाहते थे. पर अपनी धुन के पक्के नरेन्द्र को व्यवसाय में रूचि थी, और वह एक सफल एंटरप्रिन्योर बनना चाहते थे  
कैसे हुआ था फेसबुक का जन्म?
       दिव्य नरेंद्र ने अपनी उच्च शिक्षा हार्वर्ड विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी, इसी यूनिवर्सिटी में मार्क जुकरबर्ग भी पढाई कर रहे थे. दिव्य और उनके दोस्त यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए हार्वर्ड कनेक्शन नामक एक साइट बना रहे थे, फेसबुक का जन्म हॉर्वर्ड कनेक्शन सोशल साइट की निर्माण प्रक्रिया के दौरान हुआ। दिव्य हॉर्वर्ड कनेक्शन प्रॉजेक्ट पर काफी आगे बढ़ चुके थे। उसके लंबे समय बाद जुकरबर्ग मौखिक समझौते के तहत उसमें शामिल हुए। पूरी चालाकी से उन्होंने इस प्रॉजेक्ट को हाईजैक कर लिया और बाद में बाकायदा फेसबुक नाम से डोमेन रजिस्टर्ड कर उस प्रॉजेक्ट को अमली जामा पहना दिया। इस बीच दिव्य और उनके सहयोगियों की जुकरबर्ग से तीखी नोकझोंक हुई। यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट ने मामले में हस्तक्षेप किया और दिव्य को कोर्ट जाने की सलाह दी। जुकरबर्ग के साथ मुकदमेबाजी करते हुए दिव्य दूसरे प्रॉजेक्ट्स पर काम करते रहे। दो साल तक उन्होंने इनवेस्टमेंट बैंकर के तौर काम किया और इसी दौरान "सम जीरो" नाम की कंपनी बनाई।
फेसबुक के आइडिया को लेकर क़ानूनी लड़ाई
    फेसबुक के संस्थापक जुकरबर्ग ने जब दिव्य और उनके दोस्तों के आइडिया को अमलीजामा पहनाया, तो बवाल मच गया। दिव्य ने जुकरबर्ग के खिलाफ 2004 में अमेरिका की एक अदालत में मुकदमा कर दिया। फैसला दिव्य और उनके दोस्तों के पक्ष में आया। जुकरबर्ग को हर्जाने के तौर पर 650 लाख डॉलर चुकाने पडे़, लेकिन दिव्य इससे संतुष्ट नहीं हुए। उनका तर्क था कि उस समय फेसबुक के शेयरों की जो बाजार में कीमत थी, उन्हें उसके हिसाब से हर्जाना नहीं दिया गया। 
     एक बार फिर मुकदमा दायर हुआ, लेकिन इस बार दिव्य हार गए। हाल में आए कोर्ट के इस फैसले में कहा गया कि 2008 में जो फैसला हुआ था, वह एकदम सही है। फेसबुक से जुकरबर्ग की तरह बेशक दिव्य का नाम न जुड़ा हो, पर जब-जब फेसबुक के जन्म की कहानी लिखी जाएगी, तब-तब दिव्य को भी याद किया जाएगा। यही वजह रही कि जब फेसबुक के इस विवाद पर ब्लॉकबस्टर फिल्म 'द सोशल नेटवर्क' बनी तो दिव्य को एक निगेटिव कैरेक्टर के तौर पर पेश नहीं किया गया। दिव्य कहते हैं कि फिल्म से पहले मैं चिंतित था कि कहीं मुझे खलनायक के तौर पर पेश न कर दिया जाए, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। 
अमेरिका में बड़े बिजनेसमैन के तौर पर है पहचान
     आज दिव्य नरेंद्र की एक अमेरिकी बिजनेसमैन के तौर पर खास पहचान है, और वह 'सम जीरो' के सीईओ हैं। उनकी कंपनी में पूरी दुनिया के चुनिंदा 12 हजार से ज्यादा फंड एनालिस्ट काम करते हैं।
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