सोमवार, 23 जनवरी 2017

जानिए क्या है जल्लीकट्टू : आश्चर्यजनक तथ्य

      आजकल आप लोग टेलीविजन पर लगातार जल्लीकट्टू से जुड़ी खबरे देखते होंगे, कई चैनलों पर तो इस मामले पर घंटों लंबी बहस चलायी जा रही है. ऐसे में आईये आज जानते हैं क्या है जल्लीकट्टू? साथ ही इससे जुड़े कई दिलचस्प तथ्य।
  • जल्‍लीकट्टू (Jallikattu) तमिल नाडु का एक परंपरागत खेल है जो पोंगल त्यौहार पर आयोजित कराया जाता है और जिसमे बैलों से इंसानों की लड़ाई कराई जाती है. जल्लीकट्टू को तमिलनाडु के गौरव तथा संस्कृति का प्रतीक कहा जाता है। ये 2000 साल पुराना खेल है जो तमिल संस्कृति से जुड़ा है. 
  • साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने जानवरों के साथ हिंसक बर्ताव को देखते हुए इस खेल को बैन कर दिया था। 
  • जलीकट्टू त्योहार से पहले गांव के लोग अपने-अपने बैलों की प्रैक्टिस तक करवाते हैं। जहां मिट्टी के ढेर पर बैल अपनी सींगो को रगड़ कर जलीकट्टू की तैयारी करता है। बैल को खूंटे से बांधकर उसे उकसाने की प्रैक्टिस करवाई जाती है ताकि उसे गुस्सा आए और वो अपनी सींगो से वार करे।
  • खेल के शुरु होते ही पहले एक-एक करके तीन बैलों को छोड़ा जाता है। ये गांव के सबसे बूढ़े बैल होते हैं। इन बैलों को कोई नहीं पकड़ता, ये बैल गांव की शान होते हैं और उसके बाद शुरु होता है जलीकट्टू का असली खेल। मुदरै में होने वाला ये खेल तीन दिन तक चलता है। 
  • प्राचीन काल में महिलाएं अपने वर को चुनने के लिए जलीकट्टू खेल का सहारा लेती थी। जलीकट्टू खेल का आयोजन स्वंयवर की तरह होता था जो कोई भी योद्धा बैल पर काबू पाने में कामयाब होता था महिलाएं उसे अपने वर के रूप में चुनती थी. 
  • जलीकट्टू खेल का ये नाम सल्ली कासू से बना है। सल्ली का मतलब सिक्का और कासू का मतलब सींगों में बंधा हुआ। सींगों में बंधे सिक्कों को हासिल करना इस खेल का मकसद होता है। धीरे-धीरे सल्लीकासू का ये नाम जलीकट्टू हो गया। 
  • कई बार जलीकट्टू के इस खेल की तुलना स्पेन की बुलफाइटिंग से भी की जाती है लेकिन ये खेल स्पेन के खेल से काफी अलग है इसमें बैलों को मारा नहीं जाता और ना ही बैल को काबू करने वाले युवक किसी तरह के हथियार का इस्तेमाल करते हैं।
  • इस खेल के लिए जिस सांड को तैयार किया जाता है वो एक विशेष नस्ल पुलिकुलम या जेलिकट का होता है. इस नस्ल की खास बात ये है कि ये प्रजाति बड़ी आक्रामक होती है और खतरे के दौरान अपनी प्राण रक्षा करते हुए वार करती है.
  • इस खेल को तीन भागों में खेल जाता है. जो क्रमशः इस प्रकार हैं वदी मनुवीरत्तु, वायली विरत्तु और वदम मंजुवीरत्तु
  • वदी मनुवीरत्तु- ये इस खेल का सबसे खतरनाक फॉर्म होता है. जैसे ही खूंखार सांड को छोड़ा जाता है उसी दौरान व्यक्ति को इस छूटे हुए सांड की पीठ पर बैठना होता है. ये देखा गया है कि वदी मनुवीरत्तु के दौरान लोग कई बार गम्भीर रूप से घायल होते हैं और कई बार उनकी मौत तक हो जाती है. कभी न कभी आपने दक्षिण की फिल्मों के सीन में इस दृश्य को देखा होगा.
  • वायली विरत्तु- खेल के इस फॉर्म में सांड को एक ओपन एरीना में छोड़ दिया जाता है. यहां जो भी व्यक्ति सांड के करीब आता है उस पर सांड आकर्मण करता है और फिर शुरुआत होती है इंसान और जानवर के बीच की जंग की.
  • वदम मंजुवीरत्तु- जल्लीकट्टू के ये फॉर्म सबसे सुरक्षित माना जाता है और इसमें रिस्क भी कम होता है. इस फॉर्म में रिस्क की गुंजाईश कम रहती है. वदम मंजुवीरत्तु में सांड को एक 50 फीट लंबी रस्सी से बांधा जाता है जहां 7 से लेके 9 आदमियों का समूह सांड पर चढ़ाई कर उसे पराजित करता है. वदम मंजुवीरत्तु में समूह को 30 मिनट में सांड को काबू करना होता है.
  • खेल में जीतने वालों को इनाम देने के लिए मोटरसाइकिल, सोने के सिक्‍के, साइकिल, भेड़-बकरियां समेत कई चीजें खरीदी जाती हैं. 
  • जीतने वाला सांड़ अपने मालिक को डेढ़ से 2 लाख रुपए की कमाई करवा सकता है। 
  • सांड़ों को सजाने और खेल के मैदान के आसपास साज-सज्‍जा करने के लिए सामान तैयार करने वाले कारीगरों के लिए भी यह खेल आमदनी का एक सबसे बड़ा जरिया है। 
  • जलीकट्टू के दौरान जिन सांड़ों पर खेल में हिस्‍सा लेने वाले काबू पा लेते हैं। या फिर जो सांड़ कमजोर हो जाते हैं। ये सांड़ इस खेल में दोबारा हिस्‍सा नहीं ले सकते।
  • जीतने वाले सांड़ों को गाय की ब्रीडिंग के लिए रखा जाता है। इनके खानपान और रखरखाव का भी इस दौरान खास ध्‍यान रखा जाता है। साथ ही यह अगले साल होने वाले खेल में फिर से शामिल हो सकते हैं.
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